Rajasthan State Udaipur

समस्त भारत में रही महाशिवरात्रि की धूम उदयपुर के हाटकेश्वर मंदिर में किया गया महा आरती का आयोजन

आकाशे तारकम लिंगम, पाताले हाटकेश्वरम
मृत्युलोके महाकालं, त्रियलिंगम नमोस्तुते

1 मार्च 2022 का दिन यह वह दिन है, जिसे महाशिवरात्रि के रूप में पूरे हिंदू समाज ने हर्षोल्लास के साथ मनाया| समस्त भारतवर्ष के हर शिव मंदिर में एक अनोखा उल्लास देखा गया |यह पर्व हिंदू कैलेंडर के हिसाब से फागुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है| कोरोना के बाद पहली बार देश में किसी पर्व को मनाने का एक संपूर्ण मौका सभी को मिला| इसी कड़ी में मोती चौहट्टा स्थित दशोरा समाज के हाटकेश्वर मंदिर में भी अनूठे आयोजन रखे गए, जिसमें 4 तरह के अभिषेक और महाआरती रखी गई दशोरा समाज केश्री दिनेश जी दशोरा द्वारा बताया गया की यह आयोजन श्रीमान मोहनलाल जी दशोरा (अध्यक्ष) वृद्धि शंकर जी दशोरा (उपाध्यक्ष) सुशील जी दशोरा (सचिव) राजेंद्र जी दशोरा (प्रधानमंत्री) एवं समस्त दशोरा समाज की तरफ से आयोजित किया जाता है| और इसी तरह हर वर्ष रीति-रिवाजों के साथ हाटकेश्वर महादेव मंदिर में तरह तरह के आयोजनों को आयोजित किया जाता है ,एवं भक्तजनों को प्रसाद वितरण किया जाता है| आने वाले समय में और भी भव्य आयोजन दशोरा समाज इसमें करने की सोच रहा है| और साथ में उन्होंने यह भी बताया कि, हर वर्ष हाटकेश्वर जयंती को भी दशोरा समाज बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाता है, यह शुभ दिन चैत्र शुक्ल की चतुर्दशी के दिन आता है| इस वर्ष अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से आने वाली 15 अप्रैल को हाटकेश्वर जयंती मनाई जाएगी|जिसमें हाटकेश्वर महादेव को श्रीखंड का भोग लगाया जाता है एवं पूरे दशोरा समाज का भोजन किया जाता है जोकि दशोरा गली स्थित दशोरा समाज के नोहरे में आयोजित किया जाता है| इस आयोजन की सबसे खास बात यह होती है, की इस आयोजन में संपूर्ण भोजन दशोरा समाज के लोगों द्वारा ही बनाया जाता है| चाहे वह श्रीखंड हो चाहे सब्जी, किसी हलवाई को खाना बनाने के लिए नहीं बुलाया जाता|

कैसे प्रकट हुआ हाटकेश्वर महादेव का लिंग??

अति प्राचीन समय की बात है आनर्त प्रदेश अर्थात द्वारका के पास में सर्वरूपेण सम्पन्न वन प्रदेश में ऋषि मुनि अपने गृहस्थ धर्म के साथ अपनी पर्णकुटियां बनाकर रहते थे और नित्य वैदिक धर्म का पालन कर यज्ञयादगिक क्रियाओं, वेदो का अभ्यास वैसे ही वेदोपनषि्द के घोष् द्वारा तथा प्रभु प्रीत्यर्थ अनेक तरह की तपश्चर्या के प्रयोग, अग्निहोत्र अग्निषेम आदि याज्ञकी क्रियाए कर वनवास में योग्य फलाहार कर, अपना समय व्यतीत करते थे। उसी समय की बात है कि सती वियोग से व्यथित कैलाशपति शंकर नग्नावस्था मे घूमते फिरते उसी आनर्त प्रदेश में आ पहुचे। भगवान शंकर की स्वर्ण सद्दश तथा तेजपुंजयुक्त काया को देख ऋषि मुनियों की पत्नियो की बुद्धि कामवि्हल हो गई और सारा काम धंधा भूलकर शंकर को देखने लगी। अपनी पत्नियो की यह स्थिती देख ऋषि मुनि अत्यंत खिन्न हो उठे और क्रोधावश मे सदाशिव शंकर को श्राप दिया कि तुमने हमारे आश्रम को दूषित किया है, इसीलिए यह लिंग पृथ्वी पर शीघ्र ही गिर पडेगा। देखते ही देखते शंकर का लिंग पृथ्वी पर और उसी वक्त लिंग धरातल को फाडकर पाताल मे जा बसा। कैलाशपति सदाशिव शंकर को इससे खेद हुआ और लज्जावश उसी क्षण से गुप्त वास करने लगे। भगवान शंकर को गुप्त वास करने के साथ ही पृथ्वी पर अनेक उपद्रव, उत्पात तथा कष्ठ शूरू हो गये। यह सब देख ऋषि मुनि तथा पृथ्वीवासी भयभीत हो उठे। ऐसा लगने लगा की प्रलय आ गया हो। सभी ऋषि मुनि एवं देवतागण ब्रम्हाजी के पास पहूचे और उनकी स्तुती की, उन्हे प्रसन्न किया और पृथ्वी पर हो रहे उत्पातो का कारण पूछा। ब्रम्हाजी समाधिस्थ हुए एवं उस उत्पात का कारण जाना और मुनियो से कहा कि यह प्रलय का लक्षण नही है बल्कि ऋषियों के श्राप से सदाशिव शंकर का लिंग गिर पडने से उत्पन्न हुई उनकी अस्थित तथा शोकमग्न दशा के कारण ही यह सब हो रहा है। फिर ब्रम्हाजी ने स्वयं सारे देवताओ मुनियों के साथ श्री विष्णु भगवान की स्तुति की और विष्णु सहित सारे मुनि देवता तथा ब्रम्हा आनर्त प्रदेश में पहूचे। सभी ने सदाशिव शंकर की स्तुति की। वंदना कर उन्हें प्रसन्न करने का उपाय शुरू किया और जब शंकर प्रसन्न हुए तब उन्हें संसार के दुख तथा उत्पातो का स्मरण दिलाया। कैलाशपति सदाशिव शंकर ने कहा सती के वियोग से मुझे अत्यंत क्लेश पहूचा एवं इसी वजह से इस लिंग का स्थान भ्रष्ट करने की मेरी इच्छा हुई थी और मैं दिग्मबर वेश में वन उपवन में फिरता हुआ इस आनर्त प्रदेश पहुंचा तथा यहां मुनियों तथा ऋषियों के श्राप के कारण ही मैने इस लिंग का त्याग किया है। सदाशिव शंकर की यह बात सुनकर ब्राम्हण विष्णु तथा अन्य देवताओ ने उनसे विनय के साथ कहा कि आप सती के लिए शोक न करें हिमालय में मेनका के यहॉ पार्वती का जन्म होगा और वह पार्वती ही आपकी सती है जिसे आप ग्रहण कर प्रसन्न होंगे। इसिलए आप इस लिंग का पूर्ववत धारण कर लें। शंकर ने लिंग धारण करने के पूर्व देवताओं से कहा कि यदि आज से ब्राम्ह्ण लोग विधिपूर्वक लिंग का पूजन करेंगें तभी मैं इसे धारण करूंगा। अत स्वयं ब्राम्हणौ ने कहा हम भी आपके लिंग की पूजा कर सूखी प्रसन्न होंगें। वैसे आपके लिंग की संसार में पूजा होगी और पृथ्वीवासी आपके लिंग की पूजा कर अपना जीवनयापन कर प्रसन्नता को प्राप्त होंगें। तब प्रसन्न होकर शंकर ने पुन लिंग धारण कर लिया और ब्राम्हणौ विष्णु तथा अन्य देवताओ ने हाटक यानी सोने का लिंग बनाकर पाताल में उसी स्थान पर उसकी स्थापाना कर शास्त्र विधि पूर्वक उसकी पूजा अर्चना कर शंकर को प्रसन्न किया तथा पृथ्वी पर श्री महादेवजी की लिंग पूजा का माहात्यम बढ़ाकर वर्तमान संकट का निवारण किया। फिर ब्राम्हणौ विष्णु तथा अन्य देवता अपने अपने लोग में चले गए। तभी से शिवलिंग का माहात्म्य संसार में बढ गया और पृथ्वी का उत्पाद शांत हो गया। जिस लिंग का ब्रम्हाजी ने स्थापना किया यह श्री हाटकेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ और नागरों के कुल देवता माने गए।
दशोरा समाज के लिए महाशिवरात्रि एवं हाटकेश्वर जयंती दोनों पर्व बहुत ही मायने रखते हैं

जैसा कि सबको पता है महाशिवरात्रि भारतीयों का एक प्रमुख त्यौहार है। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। माघ फागुन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि का प्रारम्भ इसी दिन से हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग (जो महादेव का विशालकाय स्वरूप है) के उदय से हुआ। इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ था। साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है|भारत सहित पूरी दुनिया में महाशिवरात्रि का पावन पर्व बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है|

रिपोर्ट
नितिन दशोरा

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